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हर्ष छाजेड़

झीलों की नगरी के कलाकार द्वारा समुद्री झाग की अनूठी कला

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“इकलौती संतान होने के कारण मेरे माता पिता मुझे लेकर बहुत सुरक्षात्मक थे। बचपन में वे मुझे पड़ोस के बच्चों के साथ खेलने तक नहीं जाने देते थे। यह 1950 से 1960 का दौर था जब मेरे पास खाली समय व्यतीत करने के लिए ज्यादा विकल्प भी नही थे इसीलिए मैंने उस समय खुद को व्यस्त रखने के लिए चित्रकारी का सहारा लिया। समय के साथ में इस कला में निपुण होता गया हालांकि उच्च शिक्षा मैंने विज्ञान से की थी। वास्तव में, मुझे भोपाल के रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन भी मिल गया था लेकिन मेरे माता-पिता ने मुझे वहाँ जाने नहीं दिया। इस तरह में विज्ञान से दूर और कला के समीप आता गया। मैंने कला जगत में गणित का आश्रय लेकर मॉडर्न आर्ट्स में प्रवेश किया और शनैः शनैः इस आधुनिक कला में कुशल होता गया। मेरी रचनाएं आज भी कई आर्ट गैलरीज़ में लगी हुई हैं।

 वह शिल्प जिसने मुझे कला जगत में भिन्न पहचान दिलाई उससे मेरी भेंट काफी समय बाद हुई। हमारे घर पर शीशा साफ़ करने की सामग्री आया करती थी। यह उस समय की बात हैं जब रासायनिक क्लीनर ने भारतीय बाजार में प्रवेश नहीं किया था।  उन्ही सामग्रियों में सुखाया गया समुद्री झाग भी था। कैल्शियम और मैग्नीशियम कार्बोनेट से युक्त अमुदरी झाग का प्रयोग विरासती भवनों की खिड़कियां साफ करने के लिए किया गया था। बाद में मुझे इससे जुडी अन्य जानकारिय मिली जैसे इसमें औषधीय गुण हैं और वैद्य इसका उपयोग दवा बनाने में करते है। तब से मैंने इस साधारण से दिखने वाले तत्व में रूचि लेना शुरू किया। साल 1963  में मैंने पहली समुद्री झाग की पेंटिंग बनाई। उसके बाद यह अनूठी कला मुझे अलग ही सफ़र पर ले गयी जहाँ इसने मुझे अपेक्षाओं से परे उपलब्धियां दिलाई। 1982 में मुझे अपना पहला राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। उसके बाद कई अन्य संस्थानों ने मुझे इस अनूठी कला के लिए पुरस्कृत किया। लेकिन इन पुरस्कारों से भी बढ़कर जिस चीज़ ने मुझे प्रोत्साहित किया वह थी लोगो की प्रशंसा। कई विख्यात लोग जैसे चुनाव आयुक्त तिरुनेलै नारायण अइयर शेषन, महाराणा अरविन्द सिंह मेवाड़, राज सिंह, अमिताभ बच्चन, लता मंगेशकर, धर्मेंद्र, अशोक बिड़ला, शंकर ध्यान शर्मा, अटल बिहारी वाजपेयी, पी.वी शर्मा, राष्ट्रपति भवन की मुख्य कला क्यूरेटर श्रीमती विमला शर्मा, और राजस्थानी भाषा के प्रसिद्ध महाकवि श्री कन्हैयालाल सेठिया, ने मुझे इस अद्वितीय कला के लिए बधाई दी और इसमें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया।”

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