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भजनों की स्वर लहरियों के साथ नाचते-गाजे गणपति बप्पा को ऐसे दी जा रही विदाई

जोधपुर शहर में आज सुबह से ही लोग बड़े उत्साह के साथ नाचते-गाते हुए गणपति बप्पा को विदाई दे रहे है।

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गुलाब सागर के बाहर रखी प्रतिमाओं को बारी-बारी से विसर्जित किया जा रहा है।

जोधपुर। सूर्यनगरी में दस दिन से जारी गणेशोत्सव का आज समापन होने जा रहा है। शहर की सड़कों पर सुबह से ढोल की थाप और गणपति बप्पा मोरिया के नारों की गूंज सुनाई दे रही है। उत्साह से लबरेज लोग अलग-अलग अंदाज में बप्पा को विदा देने निकल पड़े है। शहर में गुलाब सागर, उम्मेद सागर और कायलाना में गणपति प्रतिमा विसर्जन के लिए लोग गाजे-बाजे के साथ पहुंच रहे है। सभी मार्गों पर सुरक्षा के माकूल प्रबंध किए गए है।

ऐसा है शहर का माहौल

अनन्त चतुर्दशी पर आज शहर में दस दिन से विभिन्न स्थानों पर स्थापित गणपति प्रतिमाओं को शहर के सरोवरों में विसर्जित किया जा रहा है।

शहर में सुबह से ही हर तरफ गणपति बप्पा के जयकारे गूंज रहे है। लोग बड़े उत्साह के साथ अपने-अपने क्षेत्र में स्थापित प्रतिमाओं को गाजे-बाजे के साथ लेकर जा रहे है।

कई लोग बाकायदा जुलूस के रूप में गणपति प्रतिमा को ट्रैक्टर ट्रॉली पर सजाकर डीजे की धुनों पर नाचते-गाते हुए सरोवरों तक पहुंच रहे है। हर तरफ गणपति बप्पा के भजनों की स्वर लहरिया सुनाई दे रही है।

शहर में मुख्य रूप से गुलाब सागर, उम्मेद सागर व कायलाना में प्रतिमाओं का विसर्जन किया जा रहा है। इन सरोवरों के रास्ते में पुलिस बल तैनात किया गया है।

वहीं सरोवरों में प्रतिमा विसर्जन के दौरान कोई डूब नहीं जाए इसे ध्यान में रख कुछ प्रशिक्षित लोगों को वहीं बैठाया गया है।

इस कारण करते है प्रतिमा विसर्जन

जहां बप्पा को लोगों ने अपने घर में सजाया वहीं अब उन्हें विदा करने का वक्त भी आ गया है। जिसे कि गणेश विसर्जन कहा जाता है। कहते हैं जो आता है, वो जाता भी है इसलिए अब उनके जाने का वक्त भी आ गया है।

विसर्जन संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है कि पानी में विलीन होना, ये सम्मान सूचक प्रक्रिया है इसलिए घर में पूजा के लिए प्रयोग की गई मूर्तियों को विसर्जित करके उन्हें सम्मान दिया जाता है।

विसर्जन ये सिखाता है कि मिट्टी से जन्में शरीर को मिट्टी में ही मिलना है। गणपति बप्पा की प्रतिमा मिट्टी से बनती है और पूजा के बाद वो मिट्टी में मिल जाती है।

गणपति बप्पा को मूर्त रूप में आने के लिए मिट्टी का सहारा लेना पड़ता है, मिट्टी प्रकृति की देन है लेकिन जब गणपति बप्पा पानी में विलीन होते हैं तो मिट्टी फिर प्रकृति में ही मिल जाती है।

मतलब ये कि जो लिया है उसे लौटाना ही पड़ेगा, खाली हाथ आये थे और खाली हाथ ही जाना पड़ेगा। विसर्जन ये सिखाता है कि इंसान को अगला जन्म पाने के लिए इस जन्म का त्याग करना पड़ेगा।

गणपति बप्पा की मूर्ति बनती है, उसकी पूजा होती है लेकिन फिर उन्हें अगले साल आने के लिए इस साल विसर्जित होना पड़ता है। जीवन भी यही है, अपनी जिम्मेदारियों को पूरा कीजिये और समय समाप्त होने पर अगले जन्म के लिए इस जन्म को छोड़ दीजिये।

स्त्रोत: भास्कर

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