Rajasthan Patrika News
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जोधपà¥à¤° के पीडबà¥à¤²à¥à¤¯à¥‚डी रोड सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥à¤¯ विदà¥à¤¯à¤¾ पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤·à¥à¤ ान में सदियों पà¥à¤°à¤¾à¤¨à¥‡ हसà¥à¤¤à¤²à¤¿à¤–ित गà¥à¤°à¤‚थों में विà¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ पà¥à¤°à¥‡à¤® गाथाओं का सचितà¥à¤° वरà¥à¤£à¤¨ मौजूद है, इनमें तà¥à¤°à¤¿à¤•ोणीय पà¥à¤°à¥‡à¤® पर आधारित ढोला-मारू से जà¥à¤¡à¤¼à¤¾ करीब 253 साल पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ पà¥à¤°à¥‡à¤® कावà¥à¤¯ गà¥à¤°à¤‚थ की सचितà¥à¤° हसà¥à¤¤à¤²à¤¿à¤–ित पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ मौजूद हैं। 17वीं से 19वीं शताबà¥à¤¦à¥€ की पà¥à¤°à¥‡à¤® गाथाओं पर आधारित हसà¥à¤¤à¤²à¤¿à¤–ित गà¥à¤°à¤‚थों में विसं-1819 के ढोला-मारू, 1890 के फूलजी-फूलमती, 1853 के मधà¥-मालती तथा 19वीं सदी के सदैव सावलिंगा के सचितà¥à¤° गà¥à¤°à¤‚थ संसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ में मौजूद है।
चितà¥à¤°à¥‹à¤‚ में बीकानेर, जयपà¥à¤°, कोटा और जोधपà¥à¤° शैली का सà¥à¤‚दर चितà¥à¤°à¤£ किया गया है। पà¥à¤°à¥‡à¤® की विरह गाथाओं के पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ साहितà¥à¤¯ पर अनेक शोधारà¥à¤¥à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ की ओर से शोध पà¥à¤°à¤¬à¤‚ध à¤à¥€ पà¥à¤°à¤¸à¥à¤¤à¥à¤¤ किठजा चà¥à¤•े हैं। कà¤à¥€ तलवारों की खनक से गूंजने वाले राजपà¥à¤¤à¤¾à¤¨à¤¾ (राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨) के à¤à¥à¤²à¤¸à¤¤à¥‡ रेगिसà¥à¤¤à¤¾à¤¨ में परवान चढ़ी 'ढोला-मारू' की पà¥à¤°à¥‡à¤® गाथा में मानव हृदय के रागातà¥à¤®à¤• समà¥à¤¬à¤‚ध और पà¥à¤°à¥‡à¤® की मरà¥à¤®à¤¸à¥à¤ªà¤°à¥à¤¶à¥€ दासà¥à¤¤à¤¾à¤¨ सदियों बाद आज à¤à¥€ राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨à¥€ गीतों-पोथियों और साहितà¥à¤¯ में अमर है।
विशà¥à¤µ की पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¦à¥à¤§ पà¥à¤°à¥‡à¤® गाथाओं में शà¥à¤®à¤¾à¤° 'ढोला-मारू' की पà¥à¤°à¥‡à¤® गाथा का नायक à¤à¤• à¤à¥‡à¤¸à¤¾ अदà¥à¤µà¤¿à¤¤à¥€à¤¯ पà¥à¤°à¥‡à¤®à¥€ है, जिसने बचपन के अदृशà¥à¤¯ पà¥à¤°à¥‡à¤® को पाने के लिठसंघरà¥à¤· किया और मिलन के लिठकई बाधाओं को पार कर अनà¥à¤¤à¤¤: सà¥à¤–द पà¥à¤°à¥‡à¤® की विजय पताका फहरा गया।
मारू की विरहगाथा लोकगीतों के माधà¥à¤¯à¤® से पहà¥à¤‚ची ढोला तक
पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ हसà¥à¤¤à¤²à¤¿à¤–ित गà¥à¤°à¤‚थों में कहा गया है कि पूंगल की राजकà¥à¤®à¤¾à¤°à¥€ मारवणी उरà¥à¤« मारू का विवाह बचपन में ही नरवरगढ के राजा ढोला से होता है, लेकिन ढोला जब यà¥à¤µà¤¾ होता है, तो उसका विवाह मालवा की राजकà¥à¤®à¤¾à¤°à¥€ मालवणी से कर दिया जाता है। उधर मारू को यौवन का पà¥à¤°à¤¥à¤® बसंत à¤à¤•à¤à¥‹à¤°à¤¨à¥‡ लगता है, तब वह सपने में अपने पà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¤à¤® की मधà¥à¤° छवि देखती है और उसके विरह में वà¥à¤¯à¤¾à¤•à¥à¤² होकर कबूतर -कà¥à¤°à¤œà¤¾à¤‚ व अनà¥à¤¯ पकà¥à¤·à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के माधà¥à¤¯à¤® से पà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¤à¤® ढोला को पà¥à¤°à¥‡à¤® का संदेश à¤à¥‡à¤œà¤¤à¥€ है।
मालवणी इधर मारू के पà¥à¤°à¥‡à¤® संदेश को ढोला तक पहà¥à¤‚चने से पहले ही नषà¥à¤Ÿ कर देती है। अनà¥à¤¤ में कà¥à¤› ढाढी गायक मालवा पहà¥à¤‚चकर लोकगीतों के माधà¥à¤¯à¤® से मारू की विरह गाथा ढोला को सà¥à¤¨à¤¾à¤¨à¥‡ में सफल हो जाते हैं। मारू की विरह वेदना सà¥à¤¨à¤•र ढोला ततà¥à¤•ाल मिलने के लिठअनेक बाधाओं को पार करते हà¥à¤ तीवà¥à¤°à¤—ामी ऊंट पर सवार होकर पूंगलगढ़ पहà¥à¤‚चता है और मारू की विरह वेदना का शमन करता है। मारू के साथ नरवरगढ़ लौटने के बाद दोनों पतà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के साथ आनंदपूरà¥à¤µà¤• जीवन वà¥à¤¯à¤¤à¥€à¤¤ करता है।
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