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मांडना: राजस्थान की सुभग लोक कला

राज्य की प्राचीन लोक कला के महत्त्व को समझते हुए प्रशासन ने हाल ही में एक कार्यशाला का आयोजन किया

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प्रतापगढ़:  राज्य के प्रतापगढ़ जिले में पारंपरिक लोक कला, मांडना, को संरक्षित करने के लिए 20 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला का समापन इस सप्ताहांत में हुआ। कार्यशाला में जिले के विभिन्न क्षेत्रों से आई आदिवासी महिलाओं ने भाग लिया और उनके योगदान के कारण कार्यशाला

मांडना चित्रकारी राजस्थान की एक लोक कला हैं जिसके चिन्ह प्राचीन सभ्यताओं से जुड़े माने जाते हैं। यह एक प्राचीन शैली हैं जिसमें घर की दीवारों और गृहतलों को प्राकृतिक सामग्रियों द्वारा सजाया जाता हैं। सौन्दर्यीकरण के अतिरिक्त लला गेरू और श्वेत खुरिये से बने इन मांडनों को अच्छे शगुन का द्योतक भी मन जाता हैं।

मांडने आमतौर पर सरल ज्यामितीय आकारों, जैसे त्रिकोण और चौकोर से बने होते हैं । इन्हीं आकारों को एकसाथ मिलाकर मांडनों का आकार दिया जाता हैं। इन मांडनों में मुख्यतः पारंपरिक रचनाओं को भी जोड़ा जाता हैं जैसे ‘पग्लिए’, ‘देवडी’ इत्यादि।

मांडनों की एक और खासियत यह हैं की इन्हें आज भी टहनियों व कपास से बनाया जाता हैं। चूँकि इन्हें आमतौर पर त्यौहारों के दौरान पूजा इत्यादि के उपयोग के लिए बनाया जाता हैं, कलाकार इन्हें गिलहरी या घोड़ों के बालों से बने ब्रश से बनाना पसंद नही करते।

पारंपरिक तौर पर कलाकार सर्वप्रथम फर्श व दीवारों को गोबर मिश्रित मिट्टी से लीपतें हैं। उसके बाद वे लाल गेरू व श्वेत चूने से विभिन्न आकृतियाँ बनाते हैं और उनमे पारम्परिक भरनी भरते हैं। इस तरह से बने पारंपरिक मांडनों का आकर्षण ही भिन्न होता हैं जैसे वास्तविक में इनमें कोई अलौकिक शक्ति हो जो वातावरण को सकारात्मक तरंगों से भर रही हो।

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