मीनाक्षी राठौड़

'ब्लू पॉटरी के जनक' की बेटी (कृपाल सिंह शेखावत, शिल्प गुरु और पद्म श्री विजेता)

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"हम चार बहनों में मैं सबसे बड़ी हूँ और शायद इसीलिए मेरे पिता ने मुझे अपने शिष्य के रूप में चुना। इसी के चलते मेरी परवरिश मेरी बहनों की तुलना में काफी अलग थी। जब मैं 4 साल की उम्र की थी तभी से मेरे पिता ने मुझे इस कला में प्रशिक्षण देना शुरू किया। उस उम्र में वह केवल मुझे रंगों को पीसने का कार्य सम्भ्लाते थे जो वे अपने पेंटिंग और ब्लू पॉटरी में इस्तेमाल करते। वह मुझे अन्य बच्चों के साथ खेलने भी नही देते थे। वह चाहते थे की में इस कला में प्रवीन हो जाऊ और इसके लिए वह जब भी कुछ कलात्मक बनाते तो मुझे अपने पास बिठा लेते थे जिससे में उस कार्य की बारीकियों को समझ सकु। कुछ समय बाद मैं और मेरी बहनें, पिताजी द्वारा निरीक्षित ‘शिल्पा कला मंदिर’ में जाने लगे जहां हम कला के जटिल कामों में शामिल कारीगरों को देखा करते थे। मुझे वह समय अच्छे से याद है जब मेरे पिता साढ़े तीन साल के लिए विदेश दौरे पर गये थे और यहाँ का कार्यभार मेरी मां और मुझे संभालना पड़ा। उस समय मैं  à¤¦à¤¸à¤µà¥€à¤‚ कक्षा में थी पर यही वह समय था जब मैंने ब्लू पॉटरी पर अपना ध्यान केन्द्रित करना शुरू किया था। उसके बाद जब समय आया मेरी आगे की पढाई का तब मैंने कनोडिया कॉलेज से राजनीति विज्ञान और इतिहास में स्नातक करने का फैसला किया (जयपुर में उस समय केवल दो ही कॉलेज हुआ करते थे एक कनोडिया और दूसरा महारानी)। 

इन दोनों विषयों को पढ़ते हुए दो दिन ही बीते थे जब मेरे मेरे पिता ने मुझसे इस बारे में बात की। वह मेरे चुनाव से प्रसन्न नही थे और जानना चाहते थे की मैंने ब्लू पॉटरी के भविष्य के लिए क्या सोचा हैं। फिर उन्होंने मुझे याद दिलाया कि उनके बाद इस विरासत को जिंदा रखने की जिम्मेदारी मेरी होगी। उन्होंने बहुत कठिनायों का सामना करके इस कला को देश में पुनर्जीवित किया था। दरअसल, उन्हें जब दिल्ली से जयपुर इस कला की पुनर्स्थापना के लिए बुलाया गया था उस समय यहाँ किसी को भी इस पारम्परिक कला का ज्ञान नही था। ब्लू पॉटरी के अंतिम पारंपरिक कलाकार भोला कुमार 100 वर्ष पूर्व ही अपनी देह त्याग चुके थे और उनके बाद इस कला ने भी मानो इस भूमि पर अपनी अंतिम श्वास ली थी पर किस्मत से मेरे पिता को भोला कुम्हार के ही परिवार की एक वृद्ध महिला, नाथी बाई मिली जिन्हें इस कला के सन्दर्भ में कुछ ज्ञान था। साफ़ था की मेरे पिता ने बड़ी कठिनाई से ब्लू पोटरी जैसी नाजुक कला को पुनर्जीवित किया था और वह इसे फिर से समय के पन्नों पर धूमिल नहीं होने देना चाहते थे। तो मैंने पिता के आग्रह पर फ़ाईन आर्ट्स से स्नातक किया और घर पर पिता से इस कला के सारे गुर सीखकर स्वयं को इतना सक्षम बनाया की मैं अपने गुरु की सारी उम्मीदों पर खरी उतरु। वर्ष 2008 में, जब मेरे पिताजी के स्वास्थ्य बिगड़ने लगा, तब मैंने यह स्टूडियो संभालना शुरू कर दिया और तब से मैं अपनी दो बहनों के साथ कृपाल कुंभ ब्लू पोट्टरी स्टूडियो का प्रबंधन कर रही हूं। "

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