Home news जयपà¥à¤°: परकोटे में अलग ही होती है गणगौर उतà¥à¤¸à¤µ की धूम
जयपà¥à¤°: परकोटे में अलग ही होती है गणगौर उतà¥à¤¸à¤µ की धूम
Patrika News Network Mar 30, 2017, 12:48 IST
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जयपà¥à¤°à¥¤
गणगौर à¤à¤• तà¥à¤¯à¥‹à¤¹à¤¾à¤° है जो चैतà¥à¤° शà¥à¤•à¥à¤² पकà¥à¤· की तृतीया को मनाया जाता है। होली के दूसरे दिन (चैतà¥à¤° कृषà¥à¤£ पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤ªà¤¦à¤¾) से जो नवविवाहिताà¤à¤ पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¦à¤¿à¤¨ गणगौर पूजती हैं, वे चैतà¥à¤° शà¥à¤•à¥à¤² दà¥à¤µà¤¿à¤¤à¥€à¤¯à¤¾ के दिन किसी नदी, तालाब या सरोवर पर जाकर अपनी पूजी हà¥à¤ˆ गणगौरों को पानी पिलाती हैं और दूसरे दिन सायंकाल के समय उनका विसरà¥à¤œà¤¨ कर देती हैं।
यह वà¥à¤°à¤¤ विवाहिता लड़कियों के लिठपति का अनà¥à¤°à¤¾à¤— उतà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¨ कराने वाला और कà¥à¤®à¤¾à¤°à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ को उतà¥à¤¤à¤® पति देने वाला है। इससे सà¥à¤¹à¤¾à¤—िनों का सà¥à¤¹à¤¾à¤— अखंड रहता है।
गणगौर पूजन में कनà¥à¤¯à¤¾à¤à¤‚ और महिलाà¤à¤‚ अपने लिठअखंड सौà¤à¤¾à¤—à¥à¤¯, अपने पीहर और ससà¥à¤°à¤¾à¤² की समृदà¥à¤§à¤¿ तथा गणगौर से हर वरà¥à¤· फिर से आने का आगà¥à¤°à¤¹ करती हैं। होली के दूसरे दिन से ही गणगौर का तà¥à¤¯à¥‹à¤¹à¤¾à¤° आरंठहो जाता है जो पूरे सोलह दिन तक लगातार चलता रहता है।
गणगौर के तà¥à¤¯à¥‹à¤¹à¤¾à¤° को उमंग, उतà¥à¤¸à¤¾à¤¹ और जोश से मनाया जाता है। यह उतà¥à¤¸à¤µ मसà¥à¤¤à¥€ का परà¥à¤µ है। इसमें कनà¥à¤¯à¤¾à¤à¤‚ और विवाहित सà¥à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ मिटà¥à¤Ÿà¥€ के ईसर और गौर बनाती है। और उनको सà¥à¤¨à¥à¤¦à¤° पोशाक पहनाती है और उनका शृंगार करती हैं।
सà¥à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ और कनà¥à¤¯à¤¾à¤à¤‚ इस दिन गहने और कपड़ों से सजी-धजी रहती हैं। गणगौर के दिन अविवाहित लड़कियां à¤à¤• खेल à¤à¥€ खेलती है जिसमें à¤à¤• लड़की दूलà¥à¤¹à¤¾ और दूसरी दूलà¥à¤¹à¤¨ बनती हैं।
जिनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ वे ईशर और गौर कहते हैं और उनके साथ सखियां गीत गाती हà¥à¤ˆ उन दोनों को लेकर अपने घर से निकलती है और सब मिलकर à¤à¤• बगीचे पर जाती है।
गणगौर के दिन महिलाà¤à¤‚ पीपल के पेड़ के जो ईसर और गौर बने होते है वो दोनों फेरे लेते हैं। जब फेरे पूरे हो जाते है तब ये सब नाचती और गाती है। उसके बाद ये घर जाकर उनका पूजन करती हैं, और à¤à¥‹à¤— लगाती हैं और शाम को उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ पानी पिलाती हैं।
वसंत के आगमन की खà¥à¤¶à¥€ में जयपà¥à¤° में देवी पारà¥à¤µà¤¤à¥€ को समरà¥à¤ªà¤¿à¤¤ गणगौर उतà¥à¤¸à¤µ की धूम वà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¥à¤¤ है। जयपà¥à¤° में गणगौर का तà¥à¤¯à¥‹à¤¹à¤¾à¤° महिलाओं का उतà¥à¤¸à¤µ नाम से à¤à¥€ पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¦à¥à¤§ है। अविवाहित लड़कियां मनपसंद वर की कामना करती हैं तो विवाहित महिलाà¤à¤‚ अपने पति की दीरà¥à¤˜à¤¾à¤¯à¥ की कामना करती हैं।
गणगौर की पूजा में गाठजाने वाले लोकगीत इस अनूठे परà¥à¤µ की आतà¥à¤®à¤¾ हैं। इस परà¥à¤µ में गवरजा और ईसर की बड़ी बहन और जीजाजी के रूप में गीतों के माधà¥à¤¯à¤® से पूजा होती है तथा उन गीतों के बाद अपने परिजनों के नाम लिठजाते हैं। गणगौर पूजन à¤à¤• आवशà¥à¤¯à¤• वैवाहिक रसà¥à¤® के रूप में à¤à¥€ पà¥à¤°à¤šà¤²à¤¿à¤¤ है।
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