रणथंभौर की पहाड़ी पर हैं 844 साल पुरानी दुर्लभ जैन प्रतिमाएं

Bhaskar, Nandlal Sharma

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रणथंभौर राष्ट्रीय अभयारण्य की खंडार रेंज में तारागढ़ दुर्ग की पहाड़ी पर 844 साल पुरानी 80 दुर्लभ जैन प्रतिमाएं चट्टानों में आम आदमी की नजरों से छिपी हुई हैं। सभी प्रतिमाएं दुर्ग की चट्टानों में बनी हुई है। चट्टान गुफानुमा है, जिसमें बनी प्रतिमाएं किसी को दूर से दिखाई नहीं देती। ये मूर्तियां दुर्ग की मध्य पहाड़ी पर किसने बनाई ये राज फिल्हाल बना हुआ है। इस संबंध में कोई स्पष्ट जानकारी अभी सामने नहीं आई है। 

- अनुमान है कि दुर्ग की पहाड़ी पर सैकड़ों वर्ष पूर्व यहां कोई बड़ा प्राचीन जैन मंदिर रहा होगा।

- चट्टान पर लिखे शिलालेख के अनुसार ये प्रतिमाएं 844 वर्ष पुरानी है तथा इनका संबंध राजा सिंग्द देव से हो सकता है।

- तारागढ़ दुर्ग की पहाड़ी पर खाक के पास एक गुफानुमा चट्टान पर 19 जैन प्रतिमाएं एक साथ तराशी हुई हैं। साथ ही दो जगह चरण (पैरों के निशान) भी हैं।

- इन प्रतिमाओं के ऊपर शेषनाग की छाया की तरह आकृति बनी है। इन प्रतिमाओं का दक्षिण की तरफ मुख है।

- अब नजरअंदाज की गई यह सभी 80 जैन प्रतिमाएं रहस्यात्मक बनी हुई हैं।

शिलालेखों पर सिया संवत् 1567 व जाघिराज श्रीमानसिंग्द देव का उल्लेख

- ये प्रतिमाएं सिया संवत् 1567 में बनने का उल्लेख यहां लिखे शिलालेख में है। इसी चट्टान पर 13 जैन प्रतिमाएं और भी बनी हुई हैं। जिनका मुख दक्षिण की तरफ है।

- इसमें जैन प्रतिमाओं के साथ-साथ शेर, घोड़ा, हाथी, ऊंट, कछुआ, शंक, चक्र, स्वास्तिक आदि बने हुए हैं। यहां लिखे शिलालेख पर भी संवत् 1567 और राजाधिराज श्रीमानसिंग्द देव पढ़ने में आया है।

- स्थिति को देखते हुए ऐसा लगता है कि ये दोनों चट्टानें कभी एक ही रही होंगी। इसके अलावा इन प्रतिमाओं के पास ही रास्ते में एक चट्टान पर 7 जैन प्रतिमाएं और एक स्थान पर चरण की आकृति बनी हुई है। यहां भी बड़ा शिलालेख चट्टान पर लिखा है।

विलुप्त हो गया जैन मंदिर

- पहाड़ी पर हजारों चट्टानें हैं। चट्टानों को देखें और उनकी तुलना करें तो जैन प्रतिमा वाली चट्टान सबसे बड़ी चट्टान दिखाई देती है।

- लोगों का कहना है कि यहां वर्षों पूर्व कोई विशाल जैन मंदिर रहा होगा। समय के साथ यह मंदिर लुप्त हो गया हो और प्रतिमाओं वाली चट्टान पहाड़ी पर भूस्खलन से टूटकर या खिसक कर नीचे आ गई हो।

- हालांकि दुर्ग के भीतर प्राचीन जैन मंदिर है। इसमें भगवान महावीर, पार्श्वनाथजी, आदिनाथ स्वामीजी, शांतिनाथ स्वामीजी, क्षेत्रपाल बाबा आदि की प्रतिमाएं विराजित हैं तथा जिनकी अष्टमी व चतुर्दशी को अभिषेक व पूजा अर्चना भी होती है, लेकिन मध्य पहाड़ी वाली इन प्रतिमाओं पर वर्तमान में किसी का भी ध्यान नहीं होने से इन प्रतिमाओं के आसपास कंटीली झाड़ियां आदि उग रही हैं तथा यहां तक पहुंचने का आसान रास्ता भी नहीं है।

वहां तक पहुंचने का रास्ता ही नहीं

- यहां पुरानी कचहरी के पास भूतेश्वर महादेव है। इसके सामने से दुर्ग पर एक रास्ता जा रहा है। इस रास्ते में मोरभांट के पास पहाड़ी पर एक चौराहा आता है।

- इसमें एक रास्ता पूर्व की ओर जो दुर्ग में जाता है। दूसरा उत्तर की ओर यह भी दुर्ग में जाता है। दक्षिण वाला रास्ता कस्बे की तरफ आता है। पश्चिम की तरफ जाने वाले रास्ते में यह प्रतिमाएं आती हैं।

- हालांकि यह रास्ता थोड़ी ही दूरी पर बीच में ही खत्म हो जाता है और आगे का रास्ता बहुत ही विकट है।

- रास्ते में चट्टानों के पत्थर ही पत्थर तथा खाई (खाळ) है। यहां आसानी से नहीं पहुंचा जा सकता। भास्कर की टीम इन प्रतिमाओं तक बड़ी मुश्किल से उठते-बैठते तथा हथेलियां टेक-टेक कर वहां तक पहुंची। दुर्ग में जाने वाले लोगों की नजर पश्चिम दिशा की तरफ इन प्रतिमाओं वाली चट्टान पर नहीं पड़ती। इस वजह से यह प्रतिमाएं आज तक आमजन की नजरों से दूर है।

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