Home news सà¥à¤µà¤¤à¤‚तà¥à¤°à¤¤à¤¾ संगà¥à¤°à¤¾à¤® के महानायक चंदà¥à¤°à¤¶à¥‡à¤–र आजाद की जयंती आज
सà¥à¤µà¤¤à¤‚तà¥à¤°à¤¤à¤¾ संगà¥à¤°à¤¾à¤® के महानायक चंदà¥à¤°à¤¶à¥‡à¤–र आजाद की जयंती आज
पराधीन à¤à¤¾à¤°à¤¤ में मजिसà¥à¤Ÿà¥à¤°à¥‡à¤Ÿ के समकà¥à¤· अपना नाम आजाद, पिता का नाम सà¥à¤µà¤¤à¤‚तà¥à¤°à¤¤à¤¾ और घर का पता जेलखाना बताने वाले सà¥à¤µà¤¤à¤‚तà¥à¤°à¤¤à¤¾ संगà¥à¤°à¤¾à¤® के अमर कà¥à¤°à¤¾à¤‚तिकारी चंदà¥à¤°à¤¶à¥‡à¤–र आजाद की आज जयंती है।
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सà¥à¤µà¤¤à¤‚तà¥à¤°à¤¤à¤¾ संगà¥à¤°à¤¾à¤® के अमर कà¥à¤°à¤¾à¤‚तिकारी चंदà¥à¤°à¤¶à¥‡à¤–र आजाद की आज जयंती है। जिस दिन उनके बाल मन में इस तरह के कà¥à¤°à¤¾à¤‚तिकारी उदà¥à¤—ार जागे, उसी दिन से बालक चनà¥à¤¦à¥à¤°à¤¶à¥‡à¤–र सीताराम तिवारी का नाम चंदà¥à¤°à¤¶à¥‡à¤–र 'आजाद' पड़ गया। देश के लिठअपना सरà¥à¤µà¤¸à¥à¤µ नà¥à¤¯à¥Œà¤›à¤¾à¤µà¤° करने वाले मां à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€ के वीर सपूत चंदà¥à¤°à¤¶à¥‡à¤–र आजाद की जयंती पर उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ बार-बार नमन है। काकोरी टà¥à¤°à¥‡à¤¨ डकैती और साणà¥à¤¡à¤°à¥à¤¸ की हतà¥à¤¯à¤¾ में समà¥à¤®à¤¿à¤²à¤¿à¤¤ इस निरà¥à¤à¥€à¤• देशà¤à¤•à¥à¤¤ का नाम इतिहास में अहम सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ रखता है। चंदà¥à¤°à¤¶à¥‡à¤–र आजाद का जनà¥à¤® 23 जà¥à¤²à¤¾à¤ˆ, 1906 को à¤à¤• आदिवासी गà¥à¤°à¤¾à¤® à¤à¤¾à¤¬à¤°à¤¾ में हà¥à¤† था। उनके पिता पंडित सीताराम तिवारी उतà¥à¤¤à¤° पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶ के उनà¥à¤¨à¤¾à¤µ ज़िले के बदर गांव के रहने वाले थे और अकाल के चलते आप गà¥à¤°à¤¾à¤® à¤à¤¾à¤¬à¤°à¤¾ में जा बसे। चंदà¥à¤°à¤¶à¥‡à¤–र आज़ाद का पà¥à¤°à¤¾à¤°à¤‚à¤à¤¿à¤• जीवन आदिवासी बाहà¥à¤²à¥à¤¯ कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° à¤à¤¾à¤¬à¤°à¤¾ में वà¥à¤¯à¤¤à¥€à¤¤ हà¥à¤† जहां उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने अपने à¤à¥€à¤² सखाओं के साथ धनà¥à¤·-बाण चलाना सीखा।
चंदà¥à¤°à¤¶à¥‡à¤–र बचपन में महातà¥à¤®à¤¾ गांधी से पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¤¿à¤¤ थे। मां जगरानी से काशी में संसà¥à¤•ृत पà¥à¤¨à¥‡ की आजà¥à¤žà¤¾ लेकर घर से निकले। दिसंबर, 1921 गांधीजी के असहयोग आंदोलन के आरंà¤à¤¿à¤• दौर में मातà¥à¤° चौदह वरà¥à¤· की आयॠमें बालक चंदà¥à¤°à¤¶à¥‡à¤–र ने इस आंदोलन में à¤à¤¾à¤— लिया। वह गिरफà¥à¤¤à¤¾à¤° कर लिठगठऔर उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ मजिसà¥à¤Ÿà¥à¤°à¥‡à¤Ÿ के समकà¥à¤· उपसà¥à¤¥à¤¿à¤¤ किया गया। चंदà¥à¤°à¤¶à¥‡à¤–र से उनका नाम पूछा गया तो उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने अपना नाम आजाद, पिता का नाम सà¥à¤µà¤¤à¤‚तà¥à¤°à¤¤à¤¾ और घर जेलखाना बताया। उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ 15 कोड़ों की सजा हà¥à¤ˆ और उनके पीठपर पड़ते हर कोडे के साथ 'वनà¥à¤¦à¥‡ मातरमà¥' और 'महातà¥à¤®à¤¾ गांधी की जय' का उचà¥à¤š उदà¥à¤˜à¥‹à¤· निकला और इसी घटना ने उनका नाम 'आजाद' रख दिया।
1922 में गांधी ने असहयोग आंदोलन सà¥à¤¥à¤—ित कर दिया जिससे चंदà¥à¤°à¤¶à¥‡à¤–र आजाद बहà¥à¤¤ आहत हà¥à¤à¥¤ उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने देश का सà¥à¤µà¤‚ततà¥à¤° करवाने की मन में ठान ली। चंदà¥à¤°à¤¶à¥‡à¤–र आजाद के समरà¥à¤ªà¤£ और निषà¥à¤ ा की पहचान करने के बाद हिंदà¥à¤¸à¥à¤¤à¤¾à¤¨ रिपबà¥à¤²à¤¿à¤•न à¤à¤¸à¥‹à¤¸à¤¿à¤à¤¶à¤¨ कà¥à¤°à¤¾à¤‚तिकारी दल के संसà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤• बिसà¥à¤®à¤¿à¤² ने पà¥à¤°à¥€à¤¾à¤¾à¤µà¤¿à¤¤ होकर उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ अपनी संसà¥à¤¥à¤¾ का सकà¥à¤°à¤¿à¤¯ सदसà¥à¤¯ बना लिया। चंदà¥à¤°à¤¶à¥‡à¤–र आजाद अपने साथियों के साथ संसà¥à¤¥à¤¾ के लिठधन à¤à¤•तà¥à¤°à¤¿à¤¤ करते थे। अधिकतर यह धन अंगà¥à¤°à¥‡à¤œà¥€ सरकार से लूट कर à¤à¤•तà¥à¤°à¤¿à¤¤ किया जाता था। 1925 में काकोरी कांड के फलसà¥à¤µà¤°à¥‚प अशफाक उलà¥à¤²à¤¾ खां, रामपà¥à¤°à¤¸à¤¾à¤¦ 'बिसà¥à¤®à¤¿à¤²' सहित कई अनà¥à¤¯ मà¥à¤–à¥à¤¯ कà¥à¤°à¤¾à¤‚तिकारियों को मृतà¥à¤¯à¥-दणà¥à¤¡ दिया गया था। इसके बाद चंदà¥à¤°à¤¶à¥‡à¤–र ने इस संसà¥à¤¥à¤¾ का पà¥à¤¨à¤°à¥à¤—ठन किया।
फरवरी, 1931 में जब चंदà¥à¤°à¤¶à¥‡à¤–र आजाद जवाहर लाल नेहरू से मिलने इलाहाबाद गठतो नेहरू ने चंदà¥à¤°à¤¶à¥‡à¤–र की बात सà¥à¤¨à¤¨à¥‡ से à¤à¥€ इनकार कर दिया। गà¥à¤¸à¥à¤¸à¥‡ में वहां से निकलकर चंदà¥à¤°à¤¶à¥‡à¤–र आजाद अपने साथी सà¥à¤–देव राज के साथ à¤à¤²à¥à¤«à¥à¤°à¥‡à¤¡ पारà¥à¤• चले गà¤à¥¤ वह सà¥à¤–देव के साथ आगामी योजनाओं के विषय पर विचार-विमरà¥à¤¶ कर ही रहे थे कि पà¥à¤²à¤¿à¤¸ ने उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ घेर लिया। आजाद ने अपनी जेब से पिसà¥à¤¤à¥Œà¤² निकालकर गोलियां दागनी शà¥à¤°à¥‚ कर दी। उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने सà¥à¤–देव को तो à¤à¤—ा दिया पर सà¥à¤µà¤¯à¤‚ अंगà¥à¤°à¥‡à¤œà¥‹à¤‚ का अकेले ही सामना करते रहे। दोनों ओर से गोलीबारी हà¥à¤ˆ लेकिन जब चंदà¥à¤°à¤¶à¥‡à¤–र के पास मातà¥à¤° à¤à¤• ही गोली शेष रह गई तो उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ पà¥à¤²à¤¿à¤¸ का सामना करना मà¥à¤¶à¥à¤•िल लगा। चंदà¥à¤°à¤¶à¥‡à¤–र आज़ाद ने यह पà¥à¤°à¤£ लिया हà¥à¤† था कि वह कà¤à¥€ à¤à¥€ जीवित पà¥à¤²à¤¿à¤¸ के हाथ नहीं आà¤à¤‚गे। इसी पà¥à¤°à¤£ को निà¤à¤¾à¤¤à¥‡ हà¥à¤ à¤à¤²à¥à¤«à¥à¤°à¥‡à¤¡ पारà¥à¤• में 27 फरवरी, 1931 को उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने वह बची हà¥à¤ˆ गोली सà¥à¤µà¤¯à¤‚ पर दाग के आतà¥à¤® बलिदान कर लिया।
पà¥à¤²à¤¿à¤¸ के अंदर चंदà¥à¤°à¤¶à¥‡à¤–र आजाद का à¤à¤¯ इतना था कि किसी को à¤à¥€ उनके मृत शरीर के के पास जाने तक की हिमà¥à¤®à¤¤ नहीं थी। उनके मृत शरीर पर गोलियां चलाकर पूरी तरह आशà¥à¤µà¤¸à¥à¤¤ होने के बाद ही चंदà¥à¤°à¤¶à¥‡à¤–र की मृतà¥à¤¯à¥ की पà¥à¤·à¥à¤Ÿà¤¿ की गई। सà¥à¤µà¤¤à¤‚तà¥à¤°à¤¤à¤¾ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤à¤¿ के पशà¥à¤šà¤¾à¤¤ जिस पारà¥à¤• में उनका निधन हà¥à¤† था, उसका नाम परिवरà¥à¤¤à¤¿à¤¤ कर चंदà¥à¤°à¤¶à¥‡à¤–र आजाद पारà¥à¤• और मधà¥à¤¯ पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶ के जिस गांव में वह रहे थे, उसका नाम धिमारपà¥à¤°à¤¾ से बदलकर आजादपà¥à¤°à¤¾ रखा गया है।
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